लॉकडाउन -21

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भारत विश्व में तीसरे नम्बर पर आ गया , और अब कोरोना संक्रमितो में सिर्फ़ अमेरिका और ब्राज़ील ही आगे है , लेकिन सरकार को इसकी चिंता कितनी है कहना कठिन है, लोग मर रहे हैं लेकिन सत्ता हमें अभी भी उलझाकर रखना चाहती है ताकि बढ़ती संख्या को लेकर कोई ऊँगली न उठा सके । इसलिए वह उठती ऊँगली को या तो देशद्रोही कहकर मरोड़ देना चाहती है या राष्ट्रवाद की तरफ़ घुमा देती है । यह सुखद बात है कि स्वस्थ होने वालों में हम बेहतर स्थिति में है लेकिन यक़ीन मानिए इसके लिए पूर्व की सत्ता की विकास यात्रा है जिन्होंने इस देश को इतने अस्पताल और डॉक्टर दिए वरना इस सरकार ने तो छः साल में एक अस्पताल भी नहीं बनाया है ।
कोरोना की दवाई को लेकर पूरी दुनिया परेशान है , पूरी दुनिया शोध में लगी है , भारत में भी इसकी दवाई और वेक्सीन पर काम चल रहा है लेकिन पिछले दिनो जिस तरह से इसे राष्ट्रवाद से जोड़ा गया उसे कुछ लोग मूर्खता से जोड़ रहे है लेकिन असल में वह मूर्खता नहीं एक षड्यंत्र है , ख़तरनाक और सोची समझी ताकि सत्ता को सहूलियत दी जा सके । 
पहला मामला बाबा रामदेव का है जिसने दवा बना लेने का पहले दावा किया और फिर करवाई के डर से पलट गए इस पर धरु गुप्त लिखते हैं- क्या बन गई कोरोना की दवा ?
दुनिया भर से कोरोना की दवा और टीकों की आने वाली ख़बरें हम सुनते-पढ़ते आए हैं। अब बाबा रामदेव ने तुलसी, अश्वगंधा और गिलोय जैसे कुछ रोग प्रतिरोधक पौधों से कोरोना की कारगर दवा कोरोलीन बनाने का दावा किया है। उनका कहना है कि इसके निर्माण और टेस्टिंग के लिए उन्होंने सरकार के विभिन्न मंत्रालयों से स्वीकृति लेकर यह दवा तैयार की है और कुछ मरीजों पर टेस्टिंग के बाद यह सौ फीसदी कारगर पाई गई है। अगर सच में ऐसा है तो यह देश के लिए गर्व और राहत की बात है, लेकिन इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ने ऐसी किसी दवा की जानकारी से पल्ला झाड़ लिया है। भारत सरकार के आयुष मंत्रालय को भी इसके बारे में कोई सूचना नहीं है। उसने पतंजलि से इस दवा के बारे में जानकारी मांगी है और उसके असर के बारे में संतुष्ट होने तक कोरोनील के प्रचार पर रोक लगा दी है।आईए हम दुआ करें कि पतंजलि का दावा सच हो जाय। जब तक विशेषज्ञों और सरकार के संबंधित मंत्रालयों द्वारा इस दावे की पुष्टि न हो जाय, बाबा रामदेव को विभिन्न न्यूज़ चैनलों पर इसका विज्ञापन कर लोगों के विश्वास से खिलवाड़ नहीं करना चाहिए। हां, कोरोना पर इसके प्रभाव की अंतिम पुष्टि होने तक निरापद जड़ी-बूटियों से बने इस उत्पाद को रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली दवा के रूप में प्रचारित किया जाय तो कोई हर्ज़ नहीं।
अभी बाबा रामदेव का मामला सुलझा भी नहीं था की वेक्सीन का मामला सामने आ गया और इस पर भी राष्ट्रवाद का मूलम्मा चढ़ाया जाने लगा । हैरानी कि बात तो यह है कि जिस वेक्सीन का क्लिनिकल ट्रायल की अभी शुरुआत नहीं हुई उसे 15 अगस्त से ईस्तेमाल करने की बात कही जा रही है । जो विज्ञान की थोड़ी भी समझ रखता होगा वह इस पर हँसे बग़ैर नहीं रहेगा? जबकि दुनिया के तमाम देशों का दावा है कि ऐसे टिके बनाने में महीनो लगेंगे कई जगह तो परीक्षण भी शुरू हो गए लेकिन किसी ने तारीख़ का दावा नहीं किया ।  
यह अच्छी बात होगी कि भारत वेक्सीन बनाएगा लेकिन देश के स्वतंत्रता दिवस पर लाँच करने की हड़बड़ी कितनी ज़रूरी है यह ख़तरनाक हो सकती है । किसी भी देश के लिए विज्ञान से खिलवाड़ ख़तरनाक होता है और ऐसे कई उदाहरण है जब राष्ट्रवाद की हड़बड़ी से आम लोगों की मुसीबतें बढ़ी हैं। 
हालाँकि स्वास्थ्य विज्ञान ने विवाद होने पर वेक्सीन को लेकर किए जा रहे दावों को सिरे से ख़ारिज कर दिया है लेकिन सत्ता की मंशा तो स्पष्ट हो ही गई ।आईसीएमआर (ICMR) के दुनिया का पहला कोविड-19 टीका 15 अगस्त तक तैयार करने के लक्ष्य की बात कहने के एक दिन बाद सीएसआईआर (CSIR) के सेलुलर एवं आणविक जीव विज्ञान केंद्र (सीसीएमबी) के एक शीर्ष अधिकारी ने कहा कि कोविड-19 के टीके की उम्मीद अगले साल की शुरुआत से पहले नहीं की जा सकती क्योंकि इस प्रक्रिया में काफी नैदानिक परीक्षण और आंकड़ों की जांच शामिल होती है. सीएसआईआर-सीसीएमबी (CSIR-CCMB) के निदेशक राकेश के मिश्रा ने कहा कि इस संदर्भ में आईसीएमआर का पत्र आंतरिक उपयोग के लिये हो सकता है और इसका उद्देश्य अस्पतालों पर नैदानिक मानव परीक्षण के लिये तैयार रहने का दबाव बनाना हो. इस औषधि के 15 अगस्त तक तैयार हो जाने की संभावनाओं के बारे में पूछे जाने पर मिश्रा ने ‘पीटीआई-भाषा' को बताया, “अगर सबकुछ वास्तव में बिल्कुल किताब में लिखी योजना के मुताबिक हुआ तब हम छह से आठ महीनों में इस बारे में सोच सकते हैं कि अब हमारे पास टीका है. आपको क्योंकि बड़ी संख्या में परीक्षण करना है. यह कोई ऐसी दवा नहीं है कि कोई बीमार हुआ तो आपने उसको दे दी और देखें कि वो ठीक हुआ या नहीं.” भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने शुक्रवार को कुछ चुनिंदा आयुर्विज्ञान संस्थानों और अस्पतालों को लिखा था कि वे यहां स्थित भारत बायोटेक के साथ मिलकर तैयार किया जा रहा कोरोना वायरस का टीका कोवेक्सिन के नैदानिक परीक्षणों की मंजूरी लेने के काम में तेजी लाएं. भारत बायोटेक की इस दवा को 15 अगस्त को जारी करने की योजना है.प्रमोद भार्गव ने कहा कि जबकि दवाई बनाने और बाज़ार में लाने की अपनी प्रक्रिया है इस प्रक्रिया को चिकित्सा विज्ञान की भाषा में क्लीनिकल ड्रग ट्रायल कहते हैं। यह प्रक्रिया चार चरणों में पूरी होती है। पहले चरण में दवा को जानवरों पर आजमा कर देखते हैं। इसके बुरे असर का आकलन किया जाता है। इसी दौरान यह पता लगाया जाता है कि दवा की कितनी मात्रा मनुष्य झेल पाएगा। यह असर 40 से 45 रोगियों पर परखा जाता है। दूसरे चरण में 100 से 150 मरीजों पर दवा का प्रयोग किया जाता है। तीसरे चरण में नई दवा का एक चीनी की गोली से तुलनात्मक प्रयोग करते हैं। इसे प्लेसिबो ट्रायल कहा जाता है।

यदा-कदा बीमारी विशेष की दवा जो बाजार में पहले से ही मौजूद है, उसके साथ तुलनात्मक अध्ययन-परीक्षण किया जाता है। यह प्रयोग 500 से 1000 मरीजों पर अमल में लाया जाता है। इन तीनों चरणों की कामयबी तय होने पर इस नमूने को भारतीय दवा नियंत्रक के पास लाइसेंस हेतु भेजा जाता है। लाइसेंस हासिल हो जाने पर दवा का व्यावसायिक उत्पादन शुरू होता है। फिर क्षेत्र विशेष के लोगों पर बड़ी संख्या में दवा का प्रयोग शुरू होता है। यह प्रक्रिया दवा परीक्षण के चौथे चरण का हिस्सा है। क्षेत्र विशेष में दवा का परीक्षण इसलिए किया जाता है ताकि स्थानीय जलवायु पर रोगी के प्रभाव के साथ दवा के असर की भी पड़ताल हो सके।

दवा परीक्षण का जाल : दवा निर्माता कंपनियां रोगियों पर ड्रग ट्रायल का जाल बेहद कुटिल चतुराई से फैलाती हैं। इसके लिए सरकार की नीतियां और कार्य प्रणालियां भी दोषी हैं, क्योंकि ज्यादातर राज्य सरकारें आम आदमी को बेहतर चिकित्सकीय परामर्श और मुफत इलाज करवाने में नाकाम रही हैं। ड्रग ट्रायल करने वाले डॉक्टर रोगी को मुफ्त दवा का लालच देकर उसे दवा परीक्षण-अध्ययन परियोजना का हिस्सा बना लेते हैं। अंग्रेजी में छपे दस्तावेजों पर मरीज या उसके अभिभावक से अंगूठा अथवा दस्तखत करा लिए जाते हैं। दस्तावेज अंग्रेजी में होने के कारण मरीज यह नहीं समझ पाता कि वह दवा परीक्षण के लिए मुफ्त इलाज का हिस्सा बन रहा है अथवा वास्तविक मर्ज के उपचार का? सहमति पर हस्ताक्षर होते ही ताबड़तोड़ एक फाइल बनाई जाती है, जिस पर मरीज के नाम के स्थान पर एक गुप्तनाम लिखा जाता है। यहीं से मरीज परीक्षण का विषय बन जाता है और दवा निर्माता कंपनी की नई विकसित की गई दवा से उसका इलाज शुरू हो जाता है। यह एक ऐसी दवा होती है, जिसकी उपलब्धता सिर्फ प्रयोग कर रहे डॉक्टर के पास होती है। दवा दुकानों पर नहीं मिलती। यहां डॉक्टर मरीज को यह हिदायत भी देता है कि वह खाली पत्ता यानी स्ट्रीप लौटाता रहे, ताकि उसे दवा की अगली खुराक उपलब्ध कराई जाती है।

हालांकि दुनिया की दवा निर्माता कंपनियों के पास धन की कमी नहीं है, लेकिन नए रोगाणुओं की नई दवा या टीका बनाने की प्रक्रिया बेहद खर्चीली, अनिश्चितता से भरी और लंबी अवधि तक चलने वाली होती है। इसलिए दवा कंपनियों की इन कार्यों में अधिक रुचि नहीं होती है। बीसवीं सदी का मध्य और उसके बाद का काल इस नाते स्वर्ण युग था, जब चेचक, पोलियो, टिटनेस, रेबिज और हैपिटाइटिस जैसी बीमारियों के नियंत्रण के लिए टीकों को विकसित किया गया।

दुनिया भर में दवाओं का बाजार 80 खरब रुपये से भी ज्यादा का है। पर इसमें टीकों की भागीदारी केवल तीन प्रतिशत है। विषाणुओं को समाप्त करने के लिए टीका बनाने की प्रक्रिया महंगी व लंबी होने के कारण दवा कंपनियां इसे बनाने की प्रक्रिया में हाथ नहीं डालती हैं। विकसित देशों के समूह ही इन कार्यक्रमों में धन खर्च कर सकते हैं। शायद इसीलिए कोरोना का टीका बनाने के दावे तो कई देश कर रहे हैं, लेकिन इनमें सच्चाई कितनी है, फिलहाल इसमें संदेह है।

दवा परीक्षण की नैतिकता : ड्रग ट्रायल की अपनी अहमियत है, बशर्ते वह नैतिक शुचिता और पेशागत पवित्रता से जुड़ा हो, क्योंकि एलोपैथी चिकित्सा पद्धति एक ऐसी प्रणाली है, जिसमें नई दवा की खोज उपचार की तात्कालिक जरूरत से जुड़ी होती है। इसलिए इसमें लगातार नए-नए शोधों का हिस्सा बनाकर स्वास्थ्य लाभ के लिए कारगर बनाए रखने के उपाय जारी रहते हैं। इन परीक्षणों के बाद जो दवाएं बाजार में विक्रय के लिए आती हैं, वे आजमाई हुई अर्थात साक्ष्य आधारित दवाएं होती हैं। लेकिन ड्रग ट्रायल को कुछ चिकित्सक व चिकित्सालयों ने गलत तरीके से मरीजों को धोखे में रखकर अवैध धन कमाने का धंधा बना लिया है। इसलिए इसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।

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