लॉकडाउन-28
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कोरोना के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आख़िर सरकार कर क्या रही है । हमने पहले ही कहा था कि मध्यप्रदेश में सरकार बनाने को लेकर जिस तरह से कोरोना को नज़रंदाज किया गया फिर योगी को ख़ुश करने राज्यों को आने जाने की अनुमति के कारण देश के लोग मुसीबत में है और अब भी केंद्र सरकार लगातार ग़लतियाँ करते जा रही है ।
कोरोना ने जिस तरह की रफ़्तार पकड़ ली है उसे देखते हुए कोई बड़ा क़दम नहीं उठाया गया तो आने वाले दिन बेहद ही भयावह होंगे ।
निधि शर्मा ग्वालियर लिखती हैं-लॉक डाउन की रणनीति पूरी तरह से फेल थी यह नजर आ गया है जब अमिताभ बच्चन जैसे व्यक्ति को कोरोना हो रहा है तो आप खुद समझिए कि यह किसी को भी हो सकता है क्या अमिताभ बच्चन घर से बाहर जाकर लौकी टिंडे खरीद रहे थे इसलिए उन्हें कोरोना हो गया?....... साफ है कि घर मे बैठे बैठे सारी प्रिकॉशन रखने के बावजूद आपको कोरोना हो रहा है
आज देश मे 29 हजार के आसपास कोरोना पॉजिटिव केस सामने आए है इंदौर, भोपाल ओर सूरत जैसे टियर 2 सिटीज में बड़े पैमाने पर मरीज मिलना शुरू हो गए है इंदौर में पिछले तीन दिनों से 90 के लगभग मरीज रोज मिल रहे हैं भोपाल की भी यही हालत है यहाँ रविवार काे 102 नए काेराेना मरीज मिले है यह अब तक का एक दिन का सबसे बड़ा आंकड़ा है। वहीं ग्वालियर में रिकाॅर्ड 111 पाॅजिटिव मिले है
मध्यप्रदेश के 10 जिले तो ऐसे हैं, जहां 98 दिन में कोरोना के जितने मरीज मिले थे, उससे ज्यादा तो जुलाई के 10 दिन में सामने आ चुके हैं। वहीं 10 जिले ऐसे भी हैं, जहां 10 दिन के भीतर ही कोरोना के मरीजों की संख्या डेढ़ गुनी हो गई है
कमाल की बात यह है कि अब फिर से लॉक डाउन करने में प्रशासन के हाथ पाँव फूल रहे हैं जबकि यही इंदौर कलेक्टर 30 मार्च को कोरोना के कुल 24 मरीज हो जाने पर ऐसे डेस्परेट थे कि उन्होंने इंदौर में 7 दिन का देश मे सबसे कड़ा लोकडाउन घोषित कर दिया था यहां तक कि दूध, सब्जी, किराना जैसी रोजमर्रा की चीजों पर भी पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था एक वीडियो में उन्होंने शहरवासियों को हरी सब्जी नही खाने तक की समझाइश दे दी थी आज एक दिन में तीस मार्च तक आए कुल मामलों से चार गुना ज्यादा मामले निकल रहे हैं अब क्या करेंगे इंदौर कलेक्टर?
अब यहाँ कहा जा रहा है कि अनलॉक 2 में जनता ध्यान नही रख रही है,सब्जी मंडी में भीड़ बढ़ रही है, खाने-पीने की दुकानों पर लापरवाही बरती जा रही है इसलिए यहाँ मरीज बढ़ रहे हैं
दरसअल यह मूर्ख बनाने की बात है मध्यप्रदेश में किल कोरोना अभियान चलाया जा रहा है अभियान के दौरान 11 हजार 458 सर्वे टीम लगाई गई हैं जो डोर-टू-डोर सर्वे कर रही है ऐसे में मरीजो की संख्या तो बढ़नी ही है
सीधा गणित यह है कि जितने अधिक संदिग्धों की टेस्टिंग होगी उतनी ही कोरोना मरीजो की संख्या बढ़ती हुई नजर आएगी....अब कोरोना को नही बल्कि उसके पैनिक को काबू में लाना होगा अब मरीजो की संख्या बताकर रोज डराने की जरूरत नही है जब 80 प्रतिशत मरीज बिना किसी दवाई के सिर्फ साधारण देखभाल से ही ठीक हो रहे हैं तो रोज रोज कोरोना के आँकड़े दिखा कर जनता को डराना कौन सी समझदारी की बात है ?
इधर कोरोना की वजह से जानवरो पर भी मुसीबत आने लगी है । कोविड-19 महामारी की रोकथाम के लिए लॉकडाउन लगने को दो महीने से ज़्यादा समय हो चुका है. इस दौरान साफ़ नीले आसमान, चहचहाते परिंदों और शहरों की सड़कों पर घूमते जंगली जानवरों की तस्वीरें ख़ूब आईं.
दावे किए गए कि जब कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए दुनिया घरों में क़ैद थी तो मानो क़ुदरत को उड़ने के लिए नए पर मिल गए. लेकिन आप इसे पूरी हक़ीक़त मत समझिए. क्योंकि, लॉकडाउन के कई मायने हैं. शहरों में ट्रैफ़िक कम है. प्रदूषण कम हुआ है.
इंसानों की आवाजाही कम होने से जंगली जानवरों को खुलकर घूमने का मौक़ा मिला है. लेकिन, इस लॉकडाउन का ये भी मतलब है कि बहुत से लोग पेट भरने तक का जुगाड़ नहीं कर पा रहे हैं.
अमरीका की वाइल्डलाइन कंज़र्वेशन सोसायटी के प्रमुख जोसेफ़ वाल्टसन कहते हैं, "इस लॉकडाउन का प्रकृति पर बहुत गहरा असर पड़ा है. क्योंकि आज करोड़ों लोग अचानक बेरोज़गार हो गए हैं और उनके पास अपनी रोज़ी-रोटी के जुगाड़ के लिए कुछ भी नहीं है.
दक्षिणी और दक्षिणी पूर्वी एशिया में बड़ी तादाद में शहरों से गांवों की ओर पलायन हो रहा है. जिन लोगों के हाथ से अचानक रोज़गार छिन गया है, वो गांवों को लौट रहे हैं. इनमें से कई ऐसे हैं, जिन्हें घर चलाने के लिए अवैध शिकार, जंगल काटने या अन्य ग़ैर-क़ानूनी गतिविधियों का सहारा लेना पड़ रहा है. नतीजा ये कि लॉकडाउन से प्रकृति को बहुत नुक़सान हो रहा है."
ऐसी ख़बरें हैं कि एशिया में कम्बोडिया से लेकर अफ़्रीका के केन्या तक, जंगली जानवरों का मांस के लिए शिकार किए जाने की घटनाएं बढ़ गई हैं. इसी तरह सींग के लिए गैंडों के अवैध शिकार की घटनाएं बढ़ गई हैं.
कोविड-19 के कारण जंगलों में निगरानी कम हो गई है. इससे शिकारियों को अपना काम करने का मौक़ा मिल गया है.
ग़ैर-लाभकारी संस्था वाइल्डलाइफ़ जस्टिस कमीशन की सारा स्टोनर कहती हैं, "हमें लगातार ख़ुफ़िया जानकारी मिल रही है कि अवैध शिकार करने वाले इन हालात का फ़ायदा उठा रहे हैं. जैसे कि दक्षिण अफ़्रीका के क्रूगर नेशनल पार्क में पड़ोसी मोज़ाम्बीक़ से अवैध शिकार करने वाले घुस रहे हैं."
इंसान का पेट भरेगा तभी जानवर बचेंगे
जंगलों के संरक्षण में लगे संगठनों का कहना है कि महामारी के दौर में ग़रीबों को रोज़ी-रोटी मुहैया कराना बेहद ज़रूरी है. तभी जंगलों और जंगली जानवरों को बचाया जा सकेगा.
कंज़र्वेशन इंटरनेशनल के अफ़्रीका प्रमुख ब्योर्न स्टॉच कहते हैं कि कोविड-19 महामारी के दौरान और इसके बाद भी हमें जंगलों पर निर्भर लोगों की नक़दी से आर्थिक मदद जारी रखनी होगी.
वो कहते हैं, "अगर हम केवल सामाजिक दृष्टिकोण से वनों और वन्यजीवों को बचाना चाहेंगे, तो ये संभव नहीं है. क्योंकि पर्यावरण और इसके सामाजिक प्रभाव एक दूसरे से जुड़े हैं."
इसकी एक अच्छी मिसाल केन्या में देखने को मिलती है. यहां चायुलू हिल्स रेड प्लस नाम का एक प्रोजेक्ट चलता है, जो वनों का संरक्षण करने वालों को तनख़्वाह देता है. इन लोगों को वनों की निगरानी का काम भी दिया जाता है. इसकी मदद से क़रीब चार हज़ार वर्ग किलोमीटर के जंगलों का संरक्षण किया जा रहा है.
इसी तरह लैटिन अमरीकी देश पेरू में 2010 से एक कार्बन प्रोजेक्ट के माध्यम से जंगलों की अवैध कटाई को 75 फ़ीसदr तक कम किया जा सका है. इसके लिए स्थानीय लोगों को कॉफ़ी उगाने में मदद की जाती है और इसके एवज़ में उनसे जंगलों की निगरानी कराई जाती है.
वन्य जीवों और जंगलों को बचाने का एक और तरीक़ा ये हो सकता है कि पालतू जानवरों के भरोसे बसर करने वालों की मदद की जाए. उनके लिए चरागाह विकसित किए जाएं. उनके जानवरों के रख-रखाव में सहयोग किया जाए. क्रूगर नेशनल पार्क के एक हिस्से में ऐसा किया जा रहा है. वहां पशुपालन करने वालों को नए चरागाह विकसित करने और जानवरों को पालने में सहयोग दिया जाता है. इसके एवज में वो जंगलों में अवैध गतिविधियों पर नज़र रखते हैं.
इसके अलावा विश्व खाद्य संगठन, अफ्रीकी देशों में लोगों को पोल्ट्री का रोज़गार करने में मदद करता है. इससे उन्हें सस्ते में मांस और अंडे मिलते हैं. फिर लोग जंगली जानवरों का शिकार नहीं करते. क्योंकि ये चिकन के मुक़ाबले महंगा पड़ता है.
जानवर सुरक्षित तो इंसान भी सुरक्षित
जंगली जानवरों के शिकार में वृद्धि की वजह से ही दुनिया में महामारियों का क़हर बढ़ रहा है.
विश्व आर्थिक मंच की मैरी क़्विनी लिखती हैं, "पिछले 50 वर्षों में दुनिया के 60 प्रतिशत जंगली जीव ख़त्म हो गए और पिछले 60 वर्षों में महामारियां चार गुना बढ़ गईं. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि जंगल ख़त्म होने से जंगलों में रहने वाले जीव, इंसानी बस्तियों के क़रीब आए और उनसे इबोला, एड्स और सार्स जैसे कई वायरस इंसानों तक पहुंच गए."
महामारियों की रोकथाम के लिए ज़रूरी है कि जंगली जीवों की खपत कम की जाए. जंगली जानवरों के शिकार और इनके कारोबार पर रोक लगे. ये मानव समाज की बेहतरी के लिए ज़रूरी है.
चीन जैसे देशों को अपने यहां जंगली जीवों के कारोबार पर रोक लगानी होगी. अगर ऐसा नहीं हुआ और जंगली जानवरों का शिकार और खान-पान यूं ही चलता रहा तो इंसान एक तरह से सामाजिक ख़ुदकुशी की ओर बढ़ता रहेगा और इसके कोरोना महामारी जैसे भयावाह नतीजे सामने आते रहेंगे.
दुनिया की सेहत, इसकी अर्थव्यवस्था और क़ुदरती ख़ज़ाने एक दूसरे पर निर्भर हैं.
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